+ संसार की स्थिति समझने में चन्द्रमा का उदाहरण -
(मालिनी)
भ्रमति नभसि चन्द्रः संसृतौ शश्वदंगी;
लभत उदयमस्तं पूर्णतां हीनतां च ।
कलुषितहृदयः सन् याति राशिं च राशे:;
तनुमिह तनुतस्तत्कोऽत्र मोदश्च शोकः॥25॥
नभ में ज्यों शशि भ्रमण करे, त्यों प्राणी नित्य भ्रमे संसार ।
चन्द्र-समान मनुज भी होता, उदित-अस्त अरु बाल-युवा॥
एक राशि से अन्य राशिवत्, गति से गत्यन्तर जाए ।
कलुषित भी है फिर क्यों नर तू, जग में हर्ष-विषाद करे॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार चन्द्रमा, सदा आकाश में भ्रमण करता रहता है; उसी प्रकार यह प्राणी भी निरन्तर संसार में एक गति से दूसरी गति में भ्रमण करता रहता है । जिस प्रकार चन्द्रमा उदित होता है तथा अस्त होता है; उसी प्रकार यह प्राणी भी जन्मता तथा मरता है । जिस प्रकार चन्द्रमा बढ़ता और घटता है; उसी प्रकार यह प्राणी भी बालपने को, युवापने को और वृद्धपने को प्राप्त होता है । जिस प्रकार चन्द्रमा कलंकित होकर, मीन आदि राशि से कर्क आदि राशि को प्राप्त होता है; उसी प्रकार यह प्राणी भी कलुषित चित्त होकर, एक शरीर से दूसरे शरीर को धारण करता है । इसलिए भव्य जीवों को संसार की ऐसी वास्तविक स्थिति को भलीभाँति जान कर, जन्म-मरण में कदापि हर्ष तथा शोक नहीं मानना चाहिए ।