+ उत्पन्न होना और नष्ट होना, संसार का धर्म -
तडिदिव चलमेतत्पुत्र-दारादि-सर्वं;
किमिति तदभिघाते खिद्यते बुद्धिमद्भिः ।
स्थितिजननविनाशं नोष्णतेवानलस्य;
व्यभिचरति कदाचित्सर्वभावेषु नूनम्॥26॥
स्त्री-पुत्रादिक सब ही हैं, विद्युत्-सम चंचल नश्वर ।
तो उनका विनाश होने पर, क्यों करते हैं खेद सुनर॥
यथा उष्णता अविनाभावी, सदा अग्नि के संग रहे ।
वैसे ही उत्पाद-धौव्य-व्यय, सब पदार्थ में सदा रहे॥
अन्वयार्थ : संसार में स्त्री-पुत्र आदि समस्त पदार्थ बिजली के समान चंचल तथा विनाशीक हैं; इसलिए उनके नाश होने पर, बुद्धिमानों को कदापि शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि जिस प्रकार अग्नि में उष्णपना सर्वदा रहता है; उसी प्रकार समस्त पदार्थों में उत्पादव्यय-ध्रौव्य - ये तीनों धर्म सदा रहते हैं ।