+ शोक से उत्पन्न असाताकर्म वट-बीज के समान -
प्रियजनमृतिशोकः सेव्यमानाऽतिमात्रं;
जनयति तदसातं कर्म यच्चाग्रतोऽपि ।
प्रसरति शतशाखं देहिनि क्षेत्र उप्तं;
वट इव तनुबीजं त्यज्यतां स प्रयत्नात्॥27॥
बोया हुआ बीज ज्यों फैले, शाखा और प्रशाखा में ।
प्रिय-वियोग में शोक करें तो, फलता कर्म असाता में॥
अन्वयार्थ : क्षेत्र में बोया हुआ वटवृक्ष का छोटा-सा बीज, जिस प्रकार शाखा-प्रशाखा स्वरूप परिणत होकर फैल जाता है; उसी प्रकार अपने प्रिय स्त्री-पुत्र आदि के मरने पर जो अत्यन्त शोक किया जाता है, वह शोक उस असाताकर्म को पैदा करता है, जो उत्तरोत्तर शाखा-प्रशाखारूप में परिणत होकर फैलता चला जाता है अर्थात् उस असाताकर्म के उदय से नरक-तिर्यंच आदि अनेक योनियों में भ्रमण करने से नाना प्रकार के दुःख सहने पड़ते हैं । इसलिए विद्वानों को ऐसा शोक, जैसे शीघ्र छूटे, वैसे छोड़ देना चाहिए ।