+ सूर्यदेवता भी विधि के विधान से अलग नहीं -
(मालिनी)
प्रथममुदयमुच्चै:, दूरमारोहलक्ष्मी-;
मनुभवति च पातं सोऽपि देवो दिनेशः ।
यदि किल दिनमध्ये तत्र केषां नराणां;
वसति हृदि विषादः सत्स्ववस्थान्तरेषु॥30॥
प्रात: जो रवि शोभित होता, वही शाम को होवे अस्त ।
तो पदार्थ के परिवर्तन में, करें विषाद सुधी क्यों व्यर्थ॥
अन्वयार्थ : सूर्यदेवता भी एक ही दिन में, प्रथम तो प्रातःकाल में उदित होकर ऊँचा चढ़ता हुआ अत्यन्त शोभा को धारण करता है, पश्चात् सायंकाल में अस्त हो जाता है; उसी प्रकार समस्त पदार्थों की एक अवस्था से दूसरी अवस्था होती है, उन अवस्थाओं को देख कर, ऐसा कौन बुद्धिमान मनुष्य होगा, जो अपने मन में विषाद करेगा? अर्थात् ऐसी स्वाभाविक स्थिति पर बुद्धिमान कदापि खेद नहीं कर सकते ।