
किं देवः किमु देवता किमगदो, विद्यास्ति किं किं मणिः;
किं मन्त्रं किमुताश्रयः किमु सुहृत्किंवा सगन्धोऽस्ति सः ।
अन्ये वा किमु भूपतिप्रभृतयः, सन्त्यत्र लोकत्रये;
यैः सर्वैरपि देहिनः स्वसमये, कर्मोदितं वार्यते॥32॥
क्या देवी क्या देव वैद्य क्या? विद्या हो या मणि कहो ।
मन्त्र-तन्त्र या कोई सहारा, कैसा भी हो मित्र अहो!
अथवा तीन लोक में कोई, हो बलवान महानृप भी ।
सब मिल कर भी उदयकाल में, रोक सकें नहिं कर्म कभी॥
अन्वयार्थ : तीनों लोक में भी देव, देवी, वैद्य, मणि, विद्या, मन्त्र, भृत्य, मित्र, सगन्ध तथा राजा आदि एक-एक की तो क्या बात? सब मिल कर भी प्राणियों के अपने समय में उदय आए हुए कर्म को नहीं रोक सकते ।