
सर्वत्रोद्गतशोकदावदहन,-व्याप्तं जगत्काननं;
मुग्धास्तत्र वधूमृगीगतधिय:, तिष्ठन्ति लोकैणकाः ।
कालव्याध इमान्निहन्ति पुरतः, प्राप्तान् सदा निर्दय:;
तस्माज्जीवति नोशिशुर्न च युवा, वृद्धोऽपि नो कश्चन॥34॥
इस संसार महावन में है, शोकरूप दावानल व्याप्त ।
लोकरूप मृग मृगीवधू में, मूढ़मति होकर आसक्त॥
निर्दय काल व्याध नित मारे, सन्मुख आए जन-मृग को ।
उससे कोई बचे नहीं शिशु, हो या युवा वृद्ध भी हो॥
अन्वयार्थ : यह संसाररूपी वन, सब जगह से उठे हुए शोकरूपी दावानल से व्याप्त हो रहा है । इस संसाररूपी वन में लोकरूपी मृग हैं, वे स्त्रीरूपी मृगी के वश होकर पड़े हुए हैं । यह कालरूपी व्याघ्र, आगे आए हुए उन लोकरूपी दीन मृगों को सदाकाल मारता है, जिससे इस संसार में न तो कोई बालक सदा जीता है, न कोई युवा सदा जीता है और न कोई वृद्ध ही सदा जीता है ।