
सम्पच्चारुलतः प्रियापरिलसत्, वल्लीभिरालिङ्गितः;
पुत्रादिप्रियपल्लवो रतिसुख,-प्रायैः फलैराश्रितः ।
जातः संसृतिकानने जनतरु:, कालोग्रदावानल-;
व्याप्तश्चेन्न भवेत्तदा बत बुधै,-रन्यत्किमालोक्यते॥35॥
सम्पति-चारु-लता-युत सुन्दर, रमणीरूपी बेल सहित ।
पुत्रादिक पल्लवधारी रति-जन्य सुख अरे! फल शोभित॥
भववन में उत्पन्न मनुज-तरु, कालरूप दावानल से ।
निश्चित होता भस्म अरे! क्यों, बुधजन नहिं निजहित करते?
अन्वयार्थ : सम्पदारूपी मनोहर लताओं से युक्त, स्त्रीरूपी मनोहर बेल से आलिंगन किया हुआ, पुत्र आदि उत्तम पल्लवों का धारी तथा रति से उत्पन्न सुखरूपी फल से सहित - ऐसा यह मनुष्यरूपी वृक्ष, संसाररूपी वन में पैदा हुआ है । यह मनुष्यरूपी वृक्ष, कालरूपी भयंकर दावाग्नि से भस्म न हो जाए, इसके लिए बुद्धिमानों को अवश्य उसे सार्थक करने का प्रयत्न करना चाहिए ।