
वाञ्छन्त्येव सुखं तदत्र विधिना, दत्तं परं प्राप्यते;
नूनं मृत्युमुपाश्रयन्ति मनुजा:, तत्राप्यतो बिभ्यति ।
इत्थं कामभयप्रसक्तहृदयाः, मोहान्मुधैव ध्रुवं;
दुःखोर्मिप्रचुरे पतन्ति कुधिय:, संसारघोराऽर्णवे॥36॥
सुख चाहे नर किन्तु जगत् में, सुख मिलता कर्मोदय से ।
सब जीवों का मरण सुनिश्चित, फिर भी मरने से डरते॥
इस प्रकार कामातुर और, भयातुर हुए मोह से मूढ़ ।
दु:ख-तरंग से व्याप्त भवोदधि, में गिरते हैं बुद्धि-विमूढ़॥
अन्वयार्थ : संसार में समस्त प्राणी, इन्द्रियों से पैदा हुए सुख की अभिलाषा सदा करते रहते हैं; किन्तु वह सुख, कर्मानुसार ही मिलता है, इच्छानुसार नहीं मिलता । सर्व जीव, निश्चय से मरते हैं तो भी उस मृत्यु से डरते रहते हैं । इस प्रकार मोह से कामातुर तथा भयातुर होकर, ये मूढ़-बुद्धि प्राणी, व्यर्थ ही नाना प्रकार के दुःखरूपी तरंगों से व्याप्त इस संसाररूपी समुद्र में डूबते हैं ।