
स्वसुखपयसि दीव्यन् मृत्युकैवर्तहस्त-;
प्रसृतघनजरोरु,-प्रोल्लसज्जालमध्ये ।
निकटमपि न पश्यत्यापदां चक्रमुग्रं;
भवसरसि वराको, लोकमीनौघ एषः॥37॥
मनुज-मीन सुख-सर में रमता, किन्तु काल ने डाला जाल ।
जरारूप आपत्ति निकट है, किन्तु देखता नहिं दुष्काल॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार मल्लाह से बिछाये हुए जाल में मछलियों का समूह खेलता रहता है, किन्तु समीप में स्थित उस मरणरूपी भयंकर आपत्ति के ऊपर कुछ भी ध्यान नहीं देता; उसी प्रकार यह लोकरूपी दीन मछलियों का समूह, अपने सुखरूपी जल में कालरूपी मल्लाह के हाथ से फैलाये हुए जरारूपी विस्तीर्ण जाल में क्रीड़ा करता रहता है, किन्तु 'व्यर्थ में हमारा जीवन चला जाएगा' - इस प्रकार पास में स्थित आपत्ति के ऊपर कुछ भी ध्यान नहीं देता ।