+ सभी को मरते हुए देख कर भी अपने को अमर मानना मोह की निशानी -
(शार्दूलविक्रीडित)
शृण्वन्नन्तकगोचरं गतवतः, पश्यन् बहून् गच्छतो;
मोहादेव जनस्तथापि मनुते, स्थैर्यं परं ह्यात्मनः ।
सम्प्राप्तेऽपि च वार्धके स्पृहयति, प्रायो न धर्माय यत्;
तद्बध्नात्यधिकाधिकं स्वमसकृत्, पुत्रादिभिर्बन्धनैः॥38॥
गये काल के गाल बहुत नर, देखे-सुने सदा यह जीव ।
किन्तु मोह-वश अपने को यह, प्राणी माने अमर सदैव॥
वृद्धावस्था आए फिर भी, धर्म नहीं करना चाहे ।
नारी-पुत्रादिक-बन्धन से नित प्रति दृढ़ बँधना चाहे॥
अन्वयार्थ : यह लोक, 'बहुत-से जीव मर गये' - इस बात को सुनता हुआ भी तथा बहुतों को स्वयं मरते हुए देखता हुआ भी मोह से अपनी आत्मा को इस शरीर में निश्चल ही मानता है, वृद्धावस्था के आने पर भी धर्म की ओर कुछ भी लक्ष्य नहीं देता; किन्तु उस अवस्था में भी स्त्री-पुत्र आदि के बन्धन से निरन्तर अपने को और भी ज्यादा बाँधता है ।