+ विद्वानों की भी देह के प्रति आसक्ति आश्चर्यजनक -
दुश्चेष्टाकृतकर्मशिल्पिरचितं, दुःसन्धि-दुर्बन्धनं;
सापायस्थिति दोषधातु लवत्, सर्वत्र यन्नश्वरम् ।
आधिव्याधिजरामृतिप्रभृतयो, यच्चात्र चित्रं न तत्;
तच्चित्रं स्थिरता बुधैरपि वपुष्यत्रापि यन्मृग्यते॥39॥
दुष्चेष्टा कृत कर्म-शिल्पि ने, दु:सन्धि-दुर्बन्धन से ।
व्यय-उत्पाद सहित अरु नाना, दोष कुधातु भरी जिसमें॥
आधि-व्याधि अरु जरा मरण हैं, इस तन में तो अचरज क्या?
किन्तु सुबुध भी इसे मानते, नित्य यही आश्चर्य महा॥
अन्वयार्थ : देह-सम्बन्धी जो बुरी-बुरी क्रियाएँ, उनसे किया गया जो कर्म, वही हुआ एक प्रकार का कारीगर, उससे बनाया हुआ यह शरीर है; खोटी सन्धि और खोटे बन्धन से सहित है, स्थिति-नाश से सहित है, नाना प्रकार के दोष, मल-मूत्र-वीर्य आदि सात कुधातुओं से संयुक्त है - ऐसी देह में यदि आधि-व्याधि, जरा-मरण आदि होते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है; किन्तु आश्चर्य तो इस बात का है कि विद्वान् मनुष्य भी ऐसे शरीर को सर्वथा स्थिर मानते हैं ।