+ जहाँ किसी प्रकार का दु:ख नहीं - ऐसी मुक्ति ही श्रेयस्कर -
लब्धा श्रीरिह वाञ्छिता वसुती, भुक्ता समुद्राऽवधिः;
प्राप्तास्ते विषया मनोहरतराः, स्वर्गेऽपि ये दुर्लभाः ।
पश्चाच्चेन्मृतिरागमिष्यति तत:, तत्सर्वमेतद्विषा-;
श्लिष्टं भोज्यमिवातिरम्यमपि धिक्, मुक्ति: परं मृग्यताम्॥40॥
वाञ्छित लक्ष्मी मिली और, पृथ्वी भोगी सागर-पर्यन्त ।
प्राप्त किये सब विषय मनोहर, जो देवों को भी दुर्लभ॥
फिर भी पीछे खड़ी मृत्यु का, कर विचार तो ये सब भोग ।
विष-मिश्रित भोजन-सम लगते, अत: मुक्ति ही आश्रय योग्य॥
अन्वयार्थ : इस संसार में वांछित लक्ष्मी भी प्राप्त कर ली, सागरान्त पृथ्वी का राज्य भी भोग लिया और जो विषय, स्वर्ग में भी प्राप्त नहीं हो सकते - ऐसे अत्यन्त मनोहर विषयों को भी पा लिया; किन्तु जिस समय मृत्यु पास में आएगी, उस समय अत्यन्त मनोहर ये सब बातें विष-संयुक्त भोजन के समान दुःख को देनेवाली ही होंगी । इसलिए उनके लिए धिक्कार हो - ऐसा विचार कर, हे भव्य जीवों! जहाँ पर किसी प्रकार का दुःख नहीं - ऐसी मुक्ति का ही आश्रय करो ।