+ काल (मृत्यु) से अपनी रक्षा के लिए प्रयत्न अनिवार्य -
युद्धे तावदलं रथेभतुरगा, वीराश्च दृप्ता भृशं;
मन्त्रः शौर्यसिश्च तावदतुलाः, कार्यस्य संसाधकाः ।
राज्ञोऽपि क्षुधितोऽपि निर्दयमना, यावज्जिघत्सुर्य:;
क्रुद्धो धावति नैव सन्मुखमितो, यत्नो विधेयो बुधैः॥41॥
रण में हाथी घोड़े गर्वित, योद्धा शौर्य तथा हथियार ।
मन्त्र रथादिक सभी तभी तक, हो सकते हैं नृप के यार॥
जबतक भूखा निर्दय क्रोधी जीवों का भक्षण-कामी ।
यम नहिं सन्मुख दौड़ा आवे, अत: प्रयत्न करें ज्ञानी॥
अन्वयार्थ : जब तक भूखा, निर्दयी, समस्त जीवों का विध्वंस करने वाला व क्रोधी यमराज सामने नहीं आता; तभी तक युद्ध में राजा के रथ, हाथी, घोड़ा, अत्यन्त गर्व करने वाले सुभट, मन्त्र, वीरता और अनुपम तलवार आदि काम में आते हैं; किन्तु जब यमराज सामने आ जाता है अर्थात् जब मरण समय आता है, उस समय उपर्युक्त कोई भी चीज काम में नहीं आती । इसलिए बुद्धिमान पुरुषों को जिस प्रकार बने, उस प्रकार इस काल (मृत्यु/यम) को सर्वथा नष्ट के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए ।