+ जीवन और धन की क्षणभंगुरता -
राजाऽपि क्षणमात्रतो विधिवशाद्रङ्कायते निश्चितं;
सर्वव्याधिविवर्जितोऽपि तरुणो,ऽप्याशु क्षयं गच्छति ।
अन्यैः किं किल सारतामुपगते, श्रीजीविते द्वे तयोः;
संसारे स्थितिरीदृशीति विदुषा, क्वान्यत्र कार्यो मद:॥42॥
कर्मोदयवश महानृपति भी, क्षण में निर्धन हो जाता ।
सर्व रोग परिमुक्त युवा भी, अरे! मृत्यु-मुख में जाता॥
सारभूत धन जीवन नश्वर, अन्य पदार्थों की क्या बात? ।
अरे! विचित्र दशा है जग की, अत: सुधी न करे ममकार॥
अन्वयार्थ : अपने पूर्वोपार्जित कर्म के वश से राजा भी क्षण भर में निश्चय से निर्धन हो जाता है, समस्त रोगों से रहित जवान मनुष्य भी देखते-देखते नष्ट हो जाता है; इसलिए समस्त पदार्थों में सारभूत जीवन तथा धन की भी जब संसार में ऐसी स्थिति है, तब और पदार्थों की क्या बात? अर्थात् वे तो अवश्य ही विनाशीक हैं । अतः विद्वानों को किसी पदार्थ में अहंकार नहीं करना चाहिए ।