+ सम्पदा-स्त्री-पुत्र आदि की तीव्र चंचलता -
हन्ति व्यो स मुष्टिनाथ सरितं, शुष्कां तरत्याकुलः;
तृष्णार्तामेऽथ मरीचिकाः पिबति च, प्रायः प्रमत्तो भवन् ।
प्रोत्तुङ्गाचलचूलिकागतमरुत्, प्रेङ्खत्प्रदीपोपमैः;
य: सम्पत्सुतकामिनीप्रभृतिभि:, कुर्यान्मद: मानव:॥43॥
गिरि-शिखरों पर तीव्र पवन से, कम्पित दीपक-शिखा समान ।
चञ्चल लक्ष्मी-पुत्र-कामिनी, में जो नर करता अभिमान॥
उन्मादी होकर वह नभ में, मानो करता मुष्टि-प्रहार ।
तैर रहा सूखी सरिता में, करता मृग-मरीचिका पान॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, अत्यन्त ऊँची पहाड़ की चोटी, उस पर चलती हुई जो पवन, उससे झकोरे खाते हुए दीपक के समान चञ्चल - ऐसी सम्पदा, पुत्र, स्त्री आदि में अभिमान करता है; मानो वह मनुष्य, उन्मादी होकर आकाश को मुट्ठी से मारता है, अत्यन्त आकुल होकर शुष्क नदी को तिरता है अथवा प्यास से अत्यन्त आकुल होकर मरीचिका को पीता है - ऐसा मालूम होता है ।