+ चञ्चला लक्ष्मी के चक्कर में नहीं फँसने का उपदेश -
लक्ष्मीं व्याधमृगीमतीव चपला,-माश्रित्य भूपा मृगा:;
पुत्रादीनपरान्मृगानतिरुषा, निघ्नन्ति सेर्ष्यं किल ।
सज्जीभूत-घनापदुन्नत-धनुः, संलग्न-संहच्छरं;
नो पश्यन्ति समीपमागतमपि, क्रुद्धं यमं लुब्धकम्॥44॥
चंचल हिरणी-सम सम्पति पा, नृप-मृग को ईर्ष्यादिक हो ।
भ्रात-सुतादिक अन्य मृगों को, मारे अतिशय क्रोधित हो॥
किन्तु आपदा धनुष बाण ले, क्रोधित जो हिंसक यमराज ।
है समीप में उसे न देखे, यह है अति अचरज की बात॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार राजारूपी शिकारी मृग अत्यन्त चञ्चल हिरणी के समान इस सम्पदा को पाकर, पुत्र-भाई आदि जो दूसरे मृग हैं, उनको अत्यन्त क्रोध तथा ईर्ष्या से मारते हैं; किन्तु बड़ी भारी आपत्तिरूप धनुष का धारी तथा संहाररूपी बाण को हाथ में लिये हुए और पास में आये हुए क्रोधी यमराजरूपी हिंसक की ओर कुछ भी लक्ष्य नहीं देते - यह आश्चर्य की बात है ।