
मृत्योर्मागेमेचरमागते निजजने, मोहेन यः शोककृत्;
नो गन्धोऽपि गुणस्य तस्य बहवो, दोषा पुनर्निश्चितम् ।
दुःखं वर्धत एव नश्यति चतु:, वर्गामे मतेर्विभ्रमः;
पापं रुक् च मृतिश्च दुर्गतिरथ, स्याद्दीर्घसंसारिता॥45॥
प्रियजन की मृत्यु होने पर, मोहित हो जो करते शोक ।
उन्हें गुणों की गन्ध न मिलती, निश्चित बढ़ते जाते दोष॥
पागल होकर तीव्र दु:खी हो चारों पौरुष नष्ट करें ।
पाप, रोग हो मर कर दुर्गति-रथ पर जग में भ्रमण करे॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, अपने प्रियजन के मर जाने पर, मोह के वश होकर शोक करता है, उसको किसी प्रकार गुण की प्राप्ति तो नहीं होती, किन्तु निश्चय से दोष ही उत्पन्न होते हैं, दुःख बढ़ता है, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष - ये चारों पुरुषार्थ नष्ट हो जाते हैं, बावला हो जाता है, उसको पाप तथा रोगों की उत्पत्ति भी हो जाती है और अन्त में मर भी जाता है; पश्चात् दुर्गतिरूपी रथ में बैठ कर, चिर काल तक संसार में भ्रमण करता रहता है । इसलिए विद्वानों को कदापि शोक नहीं करना चाहिए ।