
आपन्मयसंसारे, क्रियते विदुषा किमापदि विषादः ।
कस्त्रस्यति लंघनत:, प्रविधाय चतुष्पथे सदनम्॥46॥
दु:खस्वरूप है जगत् अरे! फिर बुध क्यों दु:ख में खेद करें ।
चौराहे पर भवन बनाया, क्यों दु:ख हो उल्लंघन से॥
अन्वयार्थ : यह संसार तो आपत्ति स्वरूप है । फिर भी नहीं मालूम बुद्धिमान पुरुष, आपत्ति के आने पर खेद क्यों करते हैं? क्योंकि जो चौराहे पर मकान बनाता है, वह क्या उसके उल्लंघन होने पर दुःखित होता है ?