+ मनुष्य का पागलपन -
(वसन्ततिलका)
वातूल एष किमु किं ग्रहसंगृहीतो;
भ्रान्तोथ वा किमु जनः किमथ प्रमत्तः ।
जानाति पश्यति शृणोति च जीवितादि;
विद्युच्चलं तदपि नो कुरुते स्वकार्य्॥47॥
वाय हुई या भूत लगे हैं, या फिर क्या यह पागल है? ।
देखे, जाने, सुने, अथिर सब किन्तु न अपना कार्य करे॥
अन्वयार्थ : क्या इस मनुष्य को वात रोग हो गया है? अथवा इसे किसी भूत-पिशाच ने पकड़ लिया है? अथवा यह बावला हो गया है? अथवा उन्मादी हो गया है? जो कि समस्त जीवन-धन-स्त्री-पुत्र आदि को बिजली के समान चञ्चल तथा विनाशीक जानता है, देखता है, सुनता है तो भी अपने हितरूप कार्य को अंशमात्र भी नहीं करता ।