
दत्तं नौषधमस्य नैव कथितः, कस्याप्ययं मन्त्रिणो;
नो कुर्याच्छुचमेवमुन्नतमति:,-लोकान्तरस्थे निजे ।
यत्ना यान्ति यतोङ्गिनः शिथिलतां, सर्वे मृतेः सन्निधौ;
बन्धाश्चर्मविनिर्मिताः परिलसत्, वर्षाम्बुसिक्ता इव॥48॥
अरे! दवा भी दे नहिं पाये, वैद्यादिक नहिं बुला सके ।
प्रिय-वियोग होने पर ऐसा, शोक कदापि न सुधी करे॥
जब प्राणी की मृत्यु निकट हो, तो सारे प्रयत्न निष्फल ।
चर्म-विनिर्मित सभी वस्तुएँ, जल गिरने से होंय शिथिल॥
अन्वयार्थ : अपने प्रिय मनुष्य के मर जाने पर बुद्धिमानों को ऐसा शोक कदापि नहीं करना चाहिए कि मैंने इसको दवा नहीं दी अथवा किसी वैद्य अथवा मन्त्रवादी को बुला कर नहीं दिखाया, क्योंकि जिस प्रकार चाम के बन्धन, वर्षा काल में पानी पड़ने से स्वयमेव ढीले हो जाते हैं; उसी प्रकार मनुष्य की मृत्यु समीप आने पर किये हुए प्रयत्न भी मिथ्या हो जाते हैं ।