+ मैं-मैं करने वालों के जीवन की व्यर्थता -
शिखरिणी
स्वकर्मव्याघे्रण, स्फुरितनिजकालादिमहसा;
समाघ्रातः साक्षाच्छरणरहिते संसृतिवने ।
प्रिया मे पुत्रा मे, द्रविणमपि मे मे गृहमिदं;
वदन्नेवं मे मे, पशुरिव जनो याति मरणम्॥49॥
वन में बली व्याघ्र से निर्बल, पशु मैं-मैं कर प्राण तजे ।
इस अशरण संसार-विपिन में, कर्म-व्याघ्र सबको पकड़े॥
यह सुत मेरा नारी मेरी, धन मेरा गृह मेरा है ।
पशुओं जैसा मैं-मैं करता, मनुज मरण को प्राप्त करे॥
अन्वयार्थ : जहाँ कोई शरण नहीं है - ऐसे वन में बलवान् व्याघ्र से पकड़ा हुआ दीन पशु, जिस प्रकार मैं...मैं करते हुए मर जाता है; उसी प्रकार शरण रहित इस संसाररूपी वन में अपने काल (मृत्यु) आदि बल-संयुक्त कर्मरूपी व्याघ्र से पकड़ा हुआ यह जन, 'स्त्री मेरी है, पुत्र मेरे हैं, धन मेरा है, यह घर मेरा है' - इस प्रकार मैं...मैं करता हुआ व्यर्थ मर जाता है । इसलिए विद्वानों को कदापि किसी पदार्थ में ममत्वबुद्धि नहीं रखनी चाहिए ।