+ आयु की दिन-प्रतिदिन क्षीणता -
(वसन्ततिलका)
दिनानि खण्डानि गुरूणि मृत्युना;
विहन्यमानस्य निजायुषो भृशम् ।
पतन्ति पश्यन्नपि नित्यमग्रतः;
स्थिरत्वमात्मन्यभिमन्यते जडः॥50॥
आयु मृत्यु से नष्ट हुई, ये दिन हैं उसके ही टुकड़े ।
इन्हें बीतता देखे पर निज, को थिर माने मूढ़ अरे॥
अन्वयार्थ : मृत्यु से नष्ट किये हुए अपनी आयु के बड़े-बड़े टुकड़े स्वरूप ये दिन, सदा आगे आकर पड़ते हैं अर्थात् आयु के दिन, प्रतिदिन क्षीण होते चले जाते हैं । इस बात को देखता हुआ भी यह अज्ञानी जीव, अपने को निश्चल-अविनाशी मानता है - यह आश्चर्य है ।