
कालेन प्रलयं व्रजन्ति नियतं, तेऽपीन्द्रचन्द्रादयः;
का वार्ताऽन्यजनस्य कीटसदृशो,ऽशक्तेरदीर्घायुषः ।
तस्मान्मृत्युमुपागते प्रियतमे, मोहं मुधा मा कृथाः;
कालः क्रीडति नात्र येन सहसा, तत्किञ्चिदन्विष्यताम्॥51॥
चन्द्र-सूर्य-इन्द्रादिक भी तो, हों विनष्ट जब आये काल ।
निबल कीट-सम अल्प आयु जो, अन्य जनों की है क्या बात?
अत: मृत्यु को प्राप्त हुए, प्रिय जन का व्यर्थ न शोक करो ।
ऐसा काम करो जिससे अब, पुन: काल का खेल न हो॥
अन्वयार्थ : जब बड़ी-बड़ी ॠद्धि के धारी इन्द्र-चन्द्र-सूर्य आदि भी अपने काल के आने पर मर जाते हैं, तब कीट के समान निर्बल तथा थोड़ी आयु वाले अन्य जन की क्या बात? अर्थात् वह तो अवश्य ही मरेगा । इसलिए अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के मरने पर शोक न करके कोई ऐसा काम करो, जिससे तुमको फिर न मरना पड़े ।