
संयोगो यदि विप्रयोगविधिना, चेज्जन्म तन्मृत्युना;
सम्पच्चेद्विपदा सुखं यदि तदा, दुःखेन भाव्यं ध्रुवम् ।
संसारेऽत्र मुहुमुर्हुर्बहुविधा,ऽवस्थान्तरप्रोल्लसद्;
वेषान्यत्वनटीकृताङ्गिनि सतः, शोको न हर्षः क्वचित्॥52॥
संयोगों के संग वियोग है, और जन्म के संग मरण ।
सम्पत्ति के साथ विपत्ति, दु:ख भी रहता सुख के संग॥
इस जग में यह जीव बहुत से, वेश बनाए बारम्बार ।
नट समान इसलिए सुधी नहिं, करें हर्ष या शोक अपार॥
अन्वयार्थ : जिस संसार में यह जीव, बारम्बार नाना प्रकार की जो दूसरी-दूसरी अवस्थाओं में नारकी-पशु-देव आदि नाना वेषों को धारण कर, नट के समान स्थित है; उस संसार में यदि संयोग, वियोग के साथ; जन्म, मरण के साथ; सम्पत्ति, विपत्ति के साथ और सुख, दुःख के साथ लगा हुआ है; तब विद्वानों को न तो किसी पदार्थ में शोक करना चाहिए, न हर्ष ही करना चाहिए ।