+ भवितव्यता : जो होना होता है, वैसा ही होता है -
लोकाश्चेतसि चिन्तयन्त्यनुदिनं, कल्याणमेवात्मनः;
कुर्यात्सा भवितव्यतागतवती, तत्तत्र यद्रोचते ।
मोहोल्लासवशादतिप्रसरतो, हित्वा विकल्पान् बहून्;
रागद्वेषविषोज्झितैरिति सदा, सद्भि: सुखं स्थीयताम्॥53॥
मेरा हो कल्याण सदा यह नर चित् में नित करे विचार ।
किन्तु कार्य होता है जग में होनहार की रुचि अनुसार॥
अत: मोह से हुए अनेक विकल्पों का तुम करो शमन ।
राग-द्वेष विष छोड़ सदा बुध सुख-शैय्या में करें शयन॥
अन्वयार्थ : लोक में मनुष्य, सदा इस प्रकार का विचार करते रहते हैं कि सदा हमको कल्याण की प्राप्ति हो; किन्तु दैवयोग से भवितव्य के अनुसार जैसा होना होता है, वैसा ही होता है; अपना किया हुआ कुछ भी नहीं होता । इसलिए सज्जनों को चाहिए कि वे मोह के वश से फैले हुए जो 'सुख आदि की वांछारूप' नाना प्रकार के खोटे विकल्प, उनको नाश करके, राग-द्वेषरूपी विष से रहित होकर, अपने साम्यभावरूपी सुख में स्थित रहें, तभी उनको कल्याण की प्राप्ति हो सकती है, अन्यथा प्रकार से उनको कल्याण की प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती ।