+ निर्मल चैतन्यरूपी तेज प्रत्येक प्राणी के अन्दर विराजमान -
चित्तत्त्वं तत्प्रतिप्राणि,-देह एव व्यवस्थितम् ।
तमश्छन्ना न जानन्ति, भ्रन्ति च बहिर्बहिः ॥4॥
चैतन्य-तत्त्व रहे सदा, सब प्राणियों के देह में ।
जानें न अज्ञानी उसे, वे भ्रमण करते बाह्य में॥
अन्वयार्थ : प्रत्येक प्राणी की देह में यह निर्मल चैतन्यरूपी तत्त्व विराजमान है तो भी जिन मनुष्यों की आत्माएँ अन्धकार से ढकी हुई हैं; वे इसको कुछ भी नहीं जानते तथा चैतन्य से भिन्न बाह्य पदार्थों में ही चैतन्य के भ्रम से भ्रान्त होते हैं ।