
भ्रन्तोऽपि सदा शास्त्र,-जाले महति केचन ।
न विन्दन्ति परं तत्त्वं, दारुणीव हुताशनम् ॥5॥
कुछ लोग शास्त्र पढ़ें बहुत, पर भ्रमण करते भ्रान्ति में ।
निजतत्त्व को जानें न ज्यों, नहिं अग्नि दिखती काष्ठ में॥
अन्वयार्थ : अनेक मनुष्य, अनेक शास्त्रों का निरन्तर स्वाध्याय भी करते हैं तो भी तीव्र मोहनीय कर्म के उदय से भ्रान्त होकर, लकड़ी में जिस प्रकार अग्नि नहीं मालूम होती, उसी प्रकार वे चैतन्यस्वरूप आत्मा को अंशमात्र भी नहीं जानते ।