
केचित् केनाऽपि कारुण्यात्, कथ्यमानमपि स्फुट् ।
न मन्यन्ते न शृण्वन्ति, महामोहमलीमसा: ॥6॥
यदि कोई करुणाभाव से, कथनी करे शुद्धात्म की ।
किन्तु मोह-मलीन-जन, मानें नहीं सुनते नहीं॥
अन्वयार्थ : प्रबल मोहनीय कर्म से अज्ञानी हुए अनेक मनुष्य, उत्तम पुरुषों द्वारा करुणा करके बताये हुए आत्मतत्त्व को न तो मानते ही हैं तथा न सुनते ही हैं ।