+ वस्तु का अनेकान्त (अनेक धर्मात्मक) स्वरूप -
भूरिधर्मात्मकं तत्त्वं, दुःश्रुतेर्मन्दबुद्धयः ।
जात्यन्धहस्तिरूपेण, ज्ञात्वा नश्यन्ति केचन ॥7॥
अनन्त धर्म-स्वरूप वस्तु, मूढ़-जन नहिं जानते ।
वे नष्ट हों एकान्त से, जन्मान्ध ज्यों हाथी लखें॥
अन्वयार्थ : यद्यपि वस्तु का स्वरूप अनेकान्तमय है तो भी अनेक जड़-बुद्धि जन्मान्ध मनुष्य, जिस प्रकार हाथी के एक-एक भाग को ही हाथी समझ लेते हैं और नष्ट हो जाते हैं; उसी प्रकार वे भी एकान्तस्वरूप को ही मान कर नष्ट होते हैं ।