
केचित्किञ्चित्परिज्ञाय, कुतश्चिद्गर्विताशयाः ।
जगन्मन्दं प्रपश्यन्तो, नाश्रयन्ति मनीषिणः ॥8॥
कोई किञ्चित् ज्ञान कर, विद्वान निज को मानते ।
मूर्ख समझें अन्य को, सत्संग से वंचित रहें॥
अन्वयार्थ : अनेक मनुष्य, कहीं से कुछ थोड़ी-सी बात जान कर, अपने को विद्वान् मान लेते हैं तथा अपने सामने जगत् के सब विद्वानों को मूर्ख समझते हैं, अतएव अहंकार के कारण वे सच्चे विद्वानों की संगति भी नहीं चाहते ।