+ धर्म के क्षेत्र में परीक्षाप्रधानी होना ही श्रेयस्कर -
जन्तु ुद्धरते धर्मः, पतन्तं दुःखसंकटे ।
अन्यथा स कृतो भ्रान्त्या, लोकैर्ग्राह्य: परीक्षित: ॥9॥
दुख-संकटों में फँसे जन को, तारता है धर्म ही ।
मिथ्या कहे जग धर्म को, करना परीक्षा धर्म की॥
अन्वयार्थ : संसार-संकट में फँसे हुए प्राणियों का उद्धार करने वाला धर्म ही है, किन्तु स्वार्थी दुष्टों ने उसको विपरीत कर दिया है अर्थात् उनका माना हुआ धर्म का स्वरूप, संसार में केवल डुबाने वाला ही है । इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे भलीभाँति परीक्षा कर, धर्म को ग्रहण करें ।