+ वक्ता की प्रामाणिकता से ही उसके वचनों में प्रामाणिकता -
सर्वविद्वीतरागोक्तो, धर्मः सूनृततां व्रजेत् ।
प्रामाण्यतो यतः पुंसो, वाचः प्रामाण्यमिष्यते ॥10॥
वीतरागी सर्वविद् का, कहा धर्म प्रमाण है ।
पुरुष के प्रामाण्य से ही, वचन प्रामाणिक कहें॥
अन्वयार्थ : समस्त लोकालोक के पदार्थों को जानने वाले तथा वीतरागी मनुष्य का कहा हुआ धर्म ही प्रामाणिक होता है क्योंकि मनुष्य के प्रामाण्य से ही उसके वचनों में प्रामाणिकता समझी जाती है; इसलिए जब वीतरागी तथा सर्वज्ञ प्रामाणिक पुरुष हैं, तब उनका कहा हुआ धर्म ही प्रामाणिक है - ऐसा समझना चाहिए ।