
बहिर्विषयसम्बन्धः, सर्वः सर्वस्य सर्वदा ।
अतस्तद्भिन्नचैतन्य,-बोधयोगौ तु दुर्लभो ॥11॥
बाह्य विषयों का समागम, सदा ही सबको रहे ।
किन्तु उनसे भिन्न आतम,-ज्ञान तो दुर्लभ अरे !
अन्वयार्थ : अनेक बाह्य विषयों का सम्बन्ध तो सब जीवों के साथ सदाकाल ही रहता है, किन्तु बाह्य पदार्थों के सम्बन्ध से जुदा जो ज्ञानानन्दस्वरूप चैतन्य का ज्ञान तथा सम्बन्ध है, वह अत्यन्त दुर्लभ है ।