+ पाँच लब्धियों की विशेषता ही निकट भव्य की पहचान -
लब्धिपञ्चकसामग्री,-विशेषात्पात्रतां गतः ।
भव्य: सम्यग्दृगादीनां, यः स मुक्तिपथे स्थितः ॥12॥
पञ्च लब्धि विशेषता से, पात्रता को प्राप्त जो ।
वह भव्य सम्यग्दर्शनादिक, से गहे शिव-पथ अहो !
अन्वयार्थ : जिसको सिद्धि होने वाली है - ऐसा जो भव्य, वह (1) देशनालब्धि, (2) प्रायोग्यलब्धि, (3) विशुद्धिलब्धि, (4) क्षयोपशमलब्धि तथा (5) करणलब्धि - इस प्रकार पाँच लब्धिस्वरूप सामग्री के विशेष से सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्ररूपी रत्नत्रय का पात्र बनता है अर्थात् रत्नत्रय को धारण करता है; वही मोक्षमार्ग में स्थित है - ऐसा समझना चाहिए ।