+ रत्नत्रय प्रयत्न ही कर्तव्य -
सम्यग्दृग्बोधचारित्र,-त्रितयं मुक्तिकारणम् ।
मुक्तावेव सुखं तेन, तत्र यत्नो विधीयताम् ॥13॥
सम्यक् सुदर्शन-ज्ञान-चारितमय कहा शिवपथ अहो ।
मुक्ति में ही सुख अहो!, शिव प्राप्ति का पौरुष करो॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र - इन तीनों का समुदाय अर्थात् एकता ही मुक्ति का कारण है और वास्तविक सुख की प्राप्ति मोक्ष में ही है; इसलिए भव्य जीवों को उसी के लिए प्रयत्न करना चाहिए ।