+ सम्यग्दर्शनादि का स्वरूप -
दर्शनं निश्चयः पुंसि, बोधस्तद्बोध इष्यते ।
स्थितिरत्रैव चारित्र,-मिति योगः शिवाश्रयः ॥14॥
निज आत्म का निश्चय सुदर्शन, ज्ञान सम्यग्ज्ञान है ।
थिरता उसी में चरित इनकी, एकता शिवमार्ग है॥
अन्वयार्थ : आत्मा का निश्चय सम्यग्दर्शन है, आत्मा का ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और आत्मा में निश्चल रीति से रहना सम्यक्चारित्र है - इन तीनों की एकता ही मोक्ष का कारण है ।