
एकमेव हि चैतन्यं, शुद्धनिश्चयतोऽथवा ।
कोऽवकाशो विकल्पानां, तत्राऽखण्डैकवस्तुनि ॥15 ।
चैतन्य ही शिवपन्थ है, वह शुद्धनय से एक है ।
एक वस्तु में नहीं कुछ, भेद का अवकाश है॥
अन्वयार्थ : शुद्धनिश्चयनय से एक चैतन्य ही मोक्ष का मार्ग है क्योंकि आत्मा एक अखण्ड पदार्थ है; इसलिए उसमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र आदि भेदों का अवकाश ही नहीं है अर्थात् एक अखण्ड आत्मा के सम्यग्दर्शन आदि टुकड़े नहीं हो सकते ।