+ प्रमाण-नय-निक्षेप से पार शुद्धात्मा -
प्रमाणनयनिक्षेपा, अर्वाचीने पदे स्थिताः ।
केवले च पुनस्तस्मिंस्तदेकं प्रतिभासते ॥16॥
व्यवहार में ही भेद, नय-निक्षेप और प्रमाण का ।
शुद्धनय से एक केवल, चिदातम ही भासता॥
अन्वयार्थ : जब तक आत्मा शुद्धात्मा नहीं हुआ है, तभी तक इसमें प्रमाण-नय-निक्षेप भिन्न-भिन्न मालूम पड़ते हंै, किन्तु जिस समय यह आत्मा शुद्धात्मा हो जाता है, उस समय इसमें केवल एक चैतन्यस्वरूप आत्मा ही प्रतिभासता है ।