
निश्चयैकदृशा नित्यं, तदेवेकं चिदात्मकम् ।
प्रपश्यामि गतभ्रान्ति:, व्यवहारदृशा परम् ॥17॥
यह आत्मा है नित्य चेतन एक निश्चय दृष्टि से ।
अनुभव करूँ निर्भान्त हो, हैं भेद नय-व्यवहार से॥
अन्वयार्थ : शुद्धनिश्चयनय से यह आत्मा एक नित्य और चैतन्यस्वरूप है - ऐसा मैं अनुभव करने वाला अनुभव करता हूँ, किन्तु व्यवहारनय से प्रमाण-नय-निक्षेप स्वरूप में भी इस आत्मा को भलीभाँति देखता हूँ ।