+ अर्हन्त, जगन्नाथ, प्रभु तथा ईश्वर कहलाने का अधिकारी कौन? -
अजमेकं परं शान्तं, सर्वोपाधिविवर्जितम् ।
आत्मानमात्मना ज्ञात्वा, तिष्ठेदात्मनि यः स्थिर: ॥
स एवाऽमृतमार्गस्थ:, स एवाऽमृतमश्नुते ।
स एवाऽर्हन् जगन्नाथ:, स एव प्रभुरीश्वर: ॥19॥
स एवाऽमृतमार्गस्थ:, स एवाऽमृतमश्नुते ।
स एवाऽर्हन् जगन्नाथ:, स एव प्रभुरीश्वर: ॥19॥
एक शान्त तथा अजन्मा, सर्व कर्म-विहीन जो ।
जान कर निज को स्वयं से, उसी में जो लीन हो॥
वही है शिव-पन्थ में, पाता वही है मुक्ति को ।
वही त्रिभुवननाथ अर्हन्, वही प्रभु ईश्वर अहो !
अन्वयार्थ : जो पुरुष जन्मरहित एक शान्तिस्वरूप और समस्त कर्मों से रहित अपने को अपने से जान कर, अपने में ही निश्चल रीति से ठहरता है; वही पुरुष, मोक्ष को जाने वाला है; वही मनुष्य, मोक्षसुख को प्राप्त होता है; वही, अर्हन्त जगन्नाथ प्रभु तथा ईश्वर कहलाता है । इसलिए भव्य जीवों को अपनी आत्मा में अवश्य निश्चल रीति से ठहरना चाहिए ।