+ उत्कृष्ट आत्मस्वरूप तेज को जानने वाला ही कृतकृत्य -
केवलज्ञानदृक्सौख्य,-स्वभावं तत्परं महः ।
तत्र ज्ञाते न किं ज्ञातं, दृष्टे दृष्टं श्रुते श्रुतम् ॥20॥
ज्ञान-दर्शन-सौख्य केवल तेजमय यह आत्मा ।
जो उसे जाने सुने देखे, क्या नहीं जाना सुना ?
अन्वयार्थ : जो उत्कृष्ट आत्मस्वरूप तेज है, वह केवलज्ञान और अनन्तसुखस्वरूप ही है । इसलिए जिसने इस तेज को जान लिया, उसने सबकुछ जान लिया; जिसने इस तेज को देख लिया, उसने सबकुछ देख लिया; जिसने इस तेज को सुन लिया, उसने सबकुछ सुन लिया - ऐसा समझना चाहिए ।