
इति ज्ञेयं तदेवैकं, श्रवणीयं तदेव हि ।
द्रष्टव्यं च तदेवैकं, नाऽन्यन्निश्चयतो बुधैः ॥21॥
यह एक ही है ज्ञेय एवं, यही सुनने योग्य है ।
देखने लायक यही है, अन्य कुछ नहिं ज्ञानी को॥
अन्वयार्थ : भव्य जीवों को निश्चय से एक चैतन्यस्वरूप ही जानने योग्य है, वही एक सुनने योग्य है और वही देखने योग्य है; किन्तु उससे भिन्न कोई भी वस्तु न तो जानने योग्य है, न सुनने योग्य है और न देखने योग्य है - ऐसा समझना चाहिए ।