
गुरुपदेशतोऽभ्यासात्, वैराग्यादुपलभ्य यत् ।
कृतकृत्यो भवेद्योगी, तदेवैकं न चाऽपरम् ॥22॥
गुरु-वचन से श्रुत-पठन से वैराग्य से पाकर जिसे ।
कृतकृत्य होते योगिजन वह एक है नहिं अन्य है॥
अन्वयार्थ : गुरु के उपदेश, शास्त्र के अभ्यास और वैराग्य के निमित्त से जिसे पाकर योगीश्वर कृतकृत्य हो जाते हैं; वह ही एक चैतन्यस्वरूप तेज है, अन्य कोई नहीं ।