+ इसलिए मोक्षाभिलाषियों को अवश्य चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनुभव करना चाहिए । -
परमब्रह्म को जानने वाला स्वयं परमब्रह्मस्वरूप
जानीते यः परं बह्म, कर्मण: पृथगेकताम् ।
गतं तद्गतबोधाऽत्मा, तत्स्वरूपं स गच्छति ॥24॥
जो जानता निष्कर्म एवं एक निज परमात्म को ।
परमात्मा होता स्वयं वह, प्राप्त करके बोध को॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, शुद्धात्मा में लीन होकर कर्मों से भिन्न और एकत्वस्वरूप - ऐसे उस परमब्रह्म परमात्मा को जानता है; वह पुरुष, स्वयं परमब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है ।