
परपदार्थों से ममत्व छोड़ना अनिवार्य
केनाऽपि हि परेण स्यात्, सम्बन्धो बन्धकारणम् ।
परैकत्वपदे शान्ते, मुक्तये स्थितिरात्मन: ॥25॥
किसी भी परद्रव्य के, सम्बन्ध से हो बन्ध ही ।
एकत्व शान्त निजात्मा में, लीनता मुक्ति कही॥
अन्वयार्थ : अन्य पदार्थों के साथ जो आत्मा का सम्बन्ध होता है, उससे केवल बन्ध ही होता है तथा उसी आत्मा का जो उत्कृष्ट शान्त और एकतारूप निजपद में ठहरना है, उससे मोक्ष होता है; इसलिए मोक्षाभिलाषियों को परपदार्थों से ममत्व छोड़ कर, स्व-स्वरूप में ही लीन होना चाहिए ।