
विकल्पोर्मिभरत्यक्त:, शान्तः कैवल्यमाश्रितः ।
कर्माऽभावे भवेदात्मा, वार्ताऽभावे समुद्रवत् ॥26॥
यह आत्मा हो शान्त, केवलज्ञानमय क्षय-कर्म से ।
पवन विरहित उदधिसम यह, विकल्पों से शून्य हो॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार पवन के थम जाने पर समुद्र, लहरों रहित, क्षोभ रहित तथा शान्त हो जाता है; उसी प्रकार जब इस आत्मा से सर्वथा कर्मों का सम्बन्ध छूट जाता है, तब यह आत्मा भी समस्त प्रकार के विकल्पों से रहित व केवलज्ञान सहित, शान्त हो जाता है ।