+ 'मैं मुक्तस्वरूप हूँ' - ऐसी मेरी निश्चित मति -
संयोगेन यदायातं, मत्तस्तत्सकलं परम् ।
तत्परित्यागयोगेन, मुक्तोऽहमिति मे मतिः ॥27॥
संयोग से उत्पन्न जो वे, सभी मुझसे भिन्न हैं ।
इसलिए उन वस्तुओं के, त्याग से मैं भिन्न हूँ॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दृष्टि चिन्तवन करता रहता है कि जो वस्तुएँ, संयोग से उत्पन्न हुई हैं, वे सब मुझसे भिन्न हैं तथा मुझे इस बात का परिज्ञान है कि उन संयोग से पैदा हुई समस्त वस्तुओं के त्याग से मैं मुक्त हूँ । मेरी आत्मा में किसी प्रकार के कर्म का सम्बन्ध नहीं है ।