+ राग-द्वेष के प्रसंग में भी राग-द्वेष का त्याग आवश्यक -
सम्बन्धेऽपि सति त्याज्यौ, रागद्वेषौ महात्मभिः ।
विना तेनाऽपि ये कुर्यु:, ते कुर्युः किं न वातुलाः ॥29॥
पर-संग हो तो भी तजें बुध, राग-द्बेष विकार को ।
पर-संग बिन भी हों विकारी, क्या अनिष्ट नहीं करें ?
अन्वयार्थ : सज्जनों को चाहिए कि राग-द्वेष के प्रसंग होने पर भी वे राग-द्वेष का त्याग करें; किन्तु जो प्रसंग के न होने पर भी राग-द्वेष करते हैं, वे मनुष्य, समस्त अनिष्टों को पैदा करते हैं ।