
मनोवाक्कायचेष्टाभि:, तद्विधं कर्म जृम्भते ।
उपास्यते तदेवैकं, तेभ्यो भिन्नं मुमुक्षुभिः ॥30॥
मन-वचन-तन चेष्टानुसार, बँधें करम इस जीव को ।
अत: इनसे भिन्न आत्मा, ही उपास्य मुमुक्षु को॥
अन्वयार्थ : मन-वचन-काय की चेष्टानुसार उस प्रकार के कर्म, वृद्धि को प्राप्त होते हैं; इसलिए मोक्षाभिलाषी भव्य पुरुष, मन-वचन-काय से भिन्न एक चैतन्यमात्र आत्मा की ही उपासना करते हैं ।