
द्वैततो द्वैतमद्वैताद्वैतं खलु जायते ।
लोहाल्लोहमयं पात्रं, हेम्नो हेमयं यथा ॥31॥
द्वैत से हो द्वैत अरु, अद्वैत से अद्वैत हो ।
लौह से हो लौह पात्र, सुवर्ण पात्र सुवर्ण से॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार लोहे से लोहमयी तथा सुवर्ण से सुवर्णयी पात्र की उत्पत्ति होती है; उसी प्रकार निश्चय से द्वैत से द्वैत ही होता है तथा अद्वैत से अद्वैत ही होता है ।